
जून के पहले 15 दिनों में ₹62,853 करोड़ निकाल लिए। यह आंकड़ा पढ़कर एक पल के लिए रुको और सोचो कि यह रकम कितनी बड़ी है। Rajasthan जैसे एक पूरे राज्य का सालाना बजट इससे कम है। और यह सिर्फ आधे महीने की बात है।
NSDL data के मुताबिक 2026 में FPIs ने अब तक कुल ₹2.87 लाख करोड़ Indian equities से निकाल लिए हैं जो पूरे 2025 के ₹1.66 लाख करोड़ के outflow को पहले ही पार कर चुका है। और साल अभी खत्म नहीं हुआ।
महीना दर महीना देखो तो तस्वीर और साफ होती है
January 2026 में FPIs ने ₹35,962 करोड़ निकाले। February में थोड़ी राहत मिली और ₹22,615 करोड़ का inflow आया जो 17 महीनों में सबसे ज़्यादा था। लेकिन March में जो हुआ वो record था , एक महीने में ₹1.17 लाख करोड़ की निकासी। April में ₹60,847 करोड़, May में ₹32,963 करोड़ और June के पहले दो हफ्तों में ₹62,853 करोड़।
| महीना | FPI Flow |
|---|---|
| January 2026 | ₹35,962 करोड़ निकाले |
| February 2026 | ₹22,615 करोड़ आए |
| March 2026 | ₹1,17,000 करोड़ निकाले (record) |
| April 2026 | ₹60,847 करोड़ निकाले |
| May 2026 | ₹32,963 करोड़ निकाले |
| June (पहले 15 दिन) | ₹62,853 करोड़ निकाले |
February को छोड़ दो तो बाकी हर महीने selling ही selling रही। यह कोई एक दो महीने का trend नहीं है , यह एक लंबी और persistent निकासी है।
विदेशी Investors निकल क्यों रहे हैं?
यह सबसे ज़रूरी सवाल है। कोई यूं ही इतना बड़ा दाँव नहीं छोड़ता।
Morningstar Investment Research के Himanshu Srivastava के मुताबिक Investors ऐसे माहौल में काम कर रहे हैं जहाँ major central banks की interest rate trajectory, geopolitical developments और global growth को लेकर बहुत uncertainty है।
Rupee की कमज़ोरी एक बड़ी वजह है। 2026 में Rupee करीब 6% और पिछले एक साल में करीब 10% कमज़ोर हो चुका है। यह mid-80s से गिरकर करीब 95 per dollar पर आ गया है। जब currency कमज़ोर हो तो foreign investors के dollar-denominated returns पर सीधा असर पड़ता है। वो ₹100 कमाएं और dollar में convert करें तो पहले से कम dollar मिलते हैं।
एक और factor जो बार बार सामने आ रहा है वो है India में AI trade की अनुपस्थिति। Global flows अभी semiconductor और AI-linked markets की तरफ जा रहे हैं और Indian equities इस race में उतने attractive नहीं दिख रहे।
मेरे हिसाब से यह आखिरी point सबसे underrated है। जब Nvidia जैसी companies 200% return दे रही हों तो foreign fund manager India में क्यों बैठेगा?
एक राहत की बात , Debt में आया पैसा
Equity में massive outflow के बावजूद FPIs ने June के पहले पखवाड़े में FAR route के ज़रिए debt securities में ₹13,200 करोड़ से ज़्यादा invest किए। इस channel में इस साल कुल निवेश करीब ₹28,000 करोड़ हो गया है।
यह interesting है। Equity बेच रहे हैं लेकिन Indian bonds खरीद रहे हैं। इसका मतलब है कि India पर पूरी तरह से भरोसा नहीं गया बस equity की जगह fixed income ज़्यादा safe लग रहा है अभी।
DII कर रहे हैं काम
FPI जितना बेच रहे हैं उसे absorb कौन कर रहा है? Domestic Institutional Investors यानी DII। Jefferies ने भी point किया है कि domestic mutual fund inflows, SIP contributions और pension money Indian equities के लिए एक बढ़ता हुआ cushion बन रहे हैं।
यही वजह है कि FPI की इतनी बड़ी selling के बावजूद market पूरी तरह collapse नहीं हुआ। Indian retail investors और mutual funds ने उस selling को काफी हद तक थाम लिया।
Crude और Iran Deal – एक उम्मीद की किरण
Geojit Investments के Chief Investment Strategist V K Vijayakumar का कहना है कि US-Iran peace deal की उम्मीद से Brent crude $87 per barrel से नीचे आ गया है जो भारत जैसे बड़े oil importer के लिए अच्छी खबर है।
FPI outflows की रफ्तार पिछले हफ्ते के आखिर में काफी धीमी हुई। शुक्रवार को सिर्फ ₹1,082 करोड़ की selling हुई जो इस बात का संकेत है कि selling pressure कम हो रहा है।
Policymakers ने outflows को counter करने के लिए कई कदम उठाए हैं जैसे FCNR deposits पर hedging costs के लिए RBI support, forex swap windows का विस्तार, NRI investments की higher limits और FAR route के ज़रिए government bonds तक आसान पहुँच।
आगे क्या देखना होगा?
Market experts के मुताबिक आने वाले हफ्तों में FPI flows तय होंगे US-Iran peace talks की प्रगति, US Federal Reserve के FOMC की policy decision, Bank of Japan के rate outlook और central banks की commentary से।
मान लो कोई Mumbai का एक mid-size fund manager है जो अपने clients को जवाब दे रहा है कि पैसा क्यों नहीं बढ़ा। वो यही कहेगा कि जब तक global uncertainty कम नहीं होती और Rupee stable नहीं होता तब तक foreign money वापस नहीं आएगा। और वो गलत नहीं है।
Nifty 50 पहले ही एक period में 11.2% गिर चुका है इस selling की वजह से। लेकिन यह भी सच है कि जो Investors long term के लिए SIP कर रहे हैं उनके लिए यह गिरावट एक opportunity है। FPI exodus और DII buying , यह दो ताकतें अभी एक दूसरे के खिलाफ खड़ी हैं। जब तक यह balance रहेगा market टिकेगा। लेकिन अगर FPI selling और तेज़ हुई और DII inflows कमज़ोर पड़े तो असली दबाव आएगा।
क्या तुम्हें लगता है कि US-Iran deal होने और crude सस्ता होने के बाद FPIs वापस भारतीय equities में आएंगे या global AI stocks की चमक उन्हें यहाँ आने से रोकती रहेगी?





