
अक्सर देखने में आता है कि बच्चे भूख की वजह से स्कूल नहीं जाना चाहते। अगर सुबह घर में ठीक से खाना न मिले, तो खाली पेट पढ़ाई करना किसी भी बच्चे के लिए मुमकिन नहीं है। इसी परेशानी को दूर करने के लिए सरकार ने ‘मध्याह्न भोजन योजना’ (Mid-Day Meal या MDM) शुरू की थी। इस योजना के तहत देश भर के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को मुफ्त और पौष्टिक खाना दिया जाता है।
योजना असल में है क्या
इस योजना का मकसद एकदम सीधा है। पहला—बच्चों की सेहत सुधारना, ताकि उन्हें सही पोषण मिल सके और उनका शरीर अच्छे से ग्रो करे। दूसरा—स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ाना। जब बच्चों को स्कूल में भरपेट खाना मिलेगा, तो गरीब माता-पिता भी खुशी-खुशी उन्हें रोज स्कूल भेजेंगे।
इसमें बच्चों को कोई पैकेट वाला या ठंडा खाना नहीं दिया जाता, बल्कि स्कूल परिसर में ही बना हुआ ताज़ा और गरम खाना परोसा जाता है। यह सुविधा पहली से आठवीं कक्षा (प्राथमिक और उच्च प्राथमिक) तक के बच्चों के लिए है।
क्या-क्या फायदे मिलते हैं
इस योजना के कई बड़े और सीधे फायदे देखने को मिलते हैं:
खाने-पीने की सुविधा मिलने से कुपोषण की समस्या दूर होती है और बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास बेहतर होता है।
बीच में पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों की संख्या में काफी कमी आई है।
जब बच्चे का पेट भरा होता है, तो उसका पढ़ाई में भी अच्छे से मन लगता है। एकाग्रता (Concentration) बढ़ती है।
सबसे अच्छी बात यह है कि स्कूल में सभी बच्चे एक साथ बैठकर खाते हैं। चाहे बच्चा अमीर परिवार से हो या गरीब, सबको एक जैसा खाना मिलता है, जिससे बच्चों के बीच कोई भेदभाव नहीं रहता।
इससे गरीब परिवारों के बजट पर भी बोझ कम होता है, क्योंकि बच्चे के दोपहर के खाने की चिंता खत्म हो जाती है।
इसके अलावा, खाना बनाने के लिए स्कूल में रसोइयों और हेल्पर्स को रखा जाता है, जिससे गांव और आस-पास की महिलाओं को रोजगार भी मिल जाता है।
कौन उठा सकता है इसका फायदा
इस योजना का लाभ किन बच्चों को मिलेगा, आइए जानते हैं:
- यह योजना मुख्य रूप से सरकारी और सरकार से सहायता पाने वाले (Aided) स्कूलों के बच्चों के लिए है।
- आमतौर पर 6 से 14 साल तक के बच्चे इस योजना के दायरे में आते हैं (हालांकि हर राज्य की शिक्षा नीति के हिसाब से उम्र सीमा में थोड़ा बहुत बदलाव हो सकता है)।
- यह स्कीम खासतौर पर उन गरीब और पिछड़े परिवारों के बच्चों को ध्यान में रखकर बनाई गई है, जो गरीबी रेखा से नीचे (BPL) आते हैं।
- एक सबसे जरूरी शर्त यह है कि बच्चे का नियमित रूप से स्कूल आना जरूरी है। अगर बच्चा सिर्फ नाम लिखवाकर घर बैठ जाए, तो उसे इस योजना का लाभ नहीं मिलेगा।
किन मामलों में योजना लागू नहीं होती
कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है। यह योजना 9वीं, 10वीं या उससे ऊपर की कक्षाओं (माध्यमिक या उच्च शिक्षा) के लिए नहीं है। यह सिर्फ कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों को मिलती है। इसके अलावा, प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को इसका लाभ नहीं मिलता, क्योंकि यह पूरी तरह से सरकारी योजना है।
किन दस्तावेज़ों की जरूरत होगी
स्कूल में एडमिशन के वक्त इन आम कागजातों की जरूरत पड़ती है:
- बच्चे का जन्म प्रमाण पत्र (उम्र का सुबूत)
- आधार कार्ड या कोई अन्य पहचान पत्र
- स्कूल में एडमिशन का फॉर्म
- बैंक खाते की जानकारी (अगर किसी राज्य में योजना के तहत डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर लागू हो)
आवेदन कैसे करें, पूरी प्रक्रिया
इसके लिए आपको किसी दफ्तर के चक्कर या ऑनलाइन फॉर्म भरने की जरूरत नहीं है। सारा काम स्कूल लेवल पर ऑफलाइन ही हो जाता है:
स्टेप 1 (स्कूल में एडमिशन): माता-पिता या अभिभावकों को सीधे उस सरकारी स्कूल में जाना है जहां वे बच्चे को पढ़ाना चाहते हैं। वहां जाकर एडमिशन का फॉर्म भरें।
स्टेप 2 (जानकारी की जांच): स्कूल के टीचर या अधिकारी बच्चे की उम्र और कागजातों की जांच करते हैं। वे देखते हैं कि बच्चा सही उम्र सीमा और कैटेगरी में आता है या नहीं।
स्टेप 3 (एडमिशन कन्फर्म होना): सब कुछ सही पाए जाने पर स्कूल प्रशासन माता-पिता को बता देता है कि बच्चे का एडमिशन पक्का हो गया है और उन्हें भोजन शुरू होने के समय व जरूरी नियमों की जानकारी दे दी जाती है।
स्टेप 4 (रोज स्कूल आना): मुफ्त खाने का फायदा तभी मिलेगा जब बच्चा रोज स्कूल आएगा। स्कूल के टीचर अटेंडेंस रजिस्टर से इसकी निगरानी करते हैं कि बच्चा कितनी छुट्टियां कर रहा है।
स्टेप 5 (भोजन का वितरण): लंच ब्रेक के दौरान सभी बच्चों को स्कूल में ही (क्लास में या किसी तय की गई जगह पर) ताज़ा खाना परोसा जाता है।
स्टेप 6 (समय-समय पर खाने की जांच): स्कूल प्रशासन और शिक्षा विभाग के अधिकारी समय-समय पर खाने की क्वालिटी चेक करते हैं। इसके लिए वे बच्चों और पेरेंट्स से पूछते भी हैं कि खाना कैसा बन रहा है, ताकि जरूरत पड़ने पर उसमें सुधार किया जा सके।





